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मेघवाल समाज में हजारों मेघ महापुरुष व साधु-संत हुए,जिन्होंने मेघ महाधर्म की अखंड ज्योति जलाई। उनमें राजस्थान की पावन धन्य धोरा धरती में खेड़ापा धाम के सिद्ध शिरोमणि स्वामी रामदास जी महाराज (कुल-मेघवंश,गौत्र -सेजु ) हुऐ उनके पिताजी श्री सार्दुल जी और माताजी का नाम श्रीमती अणभी देवी था। आप पैतृक गाँव भीकमकोर जिला जोधपुर के मूलनिवासी थे।
सिद्ध शिरोमणि स्वामी रामदास जी महाराज के शिष्यों में मेघवंशी स्वामी किशन दास जी महाराज हुऐ। स्वामी किशनदास जी महाराज गाँव टांकला,जिला नागौर के मूलनिवासी थे तथा उनके पिता श्री दासाराम जी और माता श्री महीदेवी थी जो मेघवाल कुल से थे। किशनाराम जी का टांकला नाम से भव्य मठ स्थापित है जो मेघवाल समाज की आध्यात्मिक गौरव गाथा का बखान करता है। ऐसे ही सैंकड़ों मठ/आश्रम/कुटिया आदि प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में सदियों से सामाजिक सौहार्द बनाए हुए हैं।
हमें यह बताया गया कि साधु की कोई जाति नहीं होती है जो निराधार है। क्योंकि वर्णव्यवस्था में साधुओं को भी ऊंच नीच के भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। हाँ,कुछ तथाकथित साधु-सन्त जो कि निम्न वर्ण के होने के कारण अपनी जाति छिपाकर श्रेष्ठ बनने एवं अपने कुल,वंश,गौत्र,माता-पिता को भुलाकर केवल गुरु परम्परा का निर्वहन करते हैं।
भारत में बहुत से सन्त अपनी अपनी जातियों का उद्धार करते रहे हैं। लेकिन जब जब भी बहुजन समाज से अर्थात वर्णव्यवस्था के अनुसार शुद्र वर्ण में जन्में साधुओं को सामाजिक जीवन में भेदभाव से गुजरना पड़ता रहा है लेकिन उनके ज्ञान (आत्म ज्ञान) से सभी कुलीन वर्ण के साधु सन्त भी थर्राते रहे हैं।
सन्त कबीर को जब जब भी इन तथाकथित सवर्ण साधुओं द्वारा जातिगत भेदभाव से प्रताड़ित होना पड़ा तो उन्हें खरी खरी कही-" जाति न पूछो साधु की,पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान।।"
सन्त शिरोमणि रैदास ने भी कहा है-"जात भी ओछी,करम भी ओछा,ओछा किसाब हमारा।नीच से प्रभु ऊंच किया है, कहत रैदास चमारा।।"
"ब्राह्मण मत पूजिए जो होवे गुणहीन, पूजिए चरण चंडाल के जो होवे गुण प्रवीन।"
जब छुआछूत व भेदभाव चरम सीमा पर था और दलितों को ज्ञान देने व मन्दिर प्रवेश पर रोक थी,तब उन्होंने निर्गुण पंथ को अपनाया। ज्ञान मार्गी बनकर आत्म ज्ञान पर बल दिया-"मन ही पूजा,मन ही धूप। मन ही सेंउ सहज स्वरूप।।"
उन सन्तों एवं महापुरुषों को कोटि कोटि प्रणाम जिन्होंने उन परिस्थितियों में भी अपने स्वाभिमान को जिंदा रखा,बिना जाति छुपाए अपने दबे-कुचले लोगों को जाग्रत किया और समाज में जन जागृति का अभियान चलाया।
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